बिहार के गया जिले के शेरघाटी थाने में दर्ज 26 साल पुराने अलकतरा घोटाले के एक मामले में पुलिस जिस कार्यपालक अभियंता को ढूंढ रही है, उनकी मौत वर्ष 2011 में ही हो चुकी है। ओबैदुर्रहमान नाम के यह कार्यपालक अभियंता मुकदमा दर्ज होने के समय आरइओ (अब आरडब्लुडी) के शेरघाटी डिवीजन में तैनात थे। दो दशक से अधिक समय की खोज के बाद इस कांड के अनुसंधान अधिकारी अरविंद यादव को पता चला कि सेवानिवृति के बाद कार्यपालक अभियंता अपने परिवार के साथ पटना के सुल्तानगंज थानाक्षेत्र में रह रहे थे, मगर वर्ष 2011 में ही उनका निधन हो गया था। परिजनों ने अनुसंधान अधिकारी को यह जानकारी दी। इंजीनियर के मृत्यु प्रमाण पत्र भी पुलिस को उपलब्ध कराए गए। इस कांड के वर्तमान अनुसंधानक सब इंस्पेक्टर अरविंद यादव से पूर्व कम से कम 16 अनुसंधान अधिकारी बदल चुके हैं, मगर अबतक अभियुक्तों की धर-पकड़ तो दूर उनके नाम-पते का सत्यापन तक नहीं हो सका था।
शेरघाटी थाने में 900 से अधिक मुकदमे हैं लम्बित
शेरघाटी थाने में अनुसंधान के लिए लम्बित मुकदमे का यह अकेला मामला नहीं है। पुलिस की मई 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार शेरघाटी थाने में अनुसंधान पूरा होने के इंतजार में 968 मुकदमे पड़े हैं। स्पष्ट है कि अनुसंधान अधिकारियों पर काम के अतिरिक्त बोझ के साथ कुछ हद तक अनुसंधानकों की सुस्ती भी बड़ी संख्या में लम्बित मुकदमों की वजह रही है।
7 लाख के घोटाले का 1999 में दर्ज हुआ था मुकदमा
बता दें कि वर्ष 1999 में आरईओ के शेरघाटी डिवीजन में अलकतरा खरीद के मामले में करीब 7 लाख रुपये की गड़बड़ी के सामने आने के बाद तत्कालीन सीओ ने शेरघाटी थाने में घपलेबाजी के आरोप में सात अभियुक्तों के खिलाफ नामजद मुकदमा (127/99) दर्ज कराया था।
पुलिस ने बताया कि शुरुआती अनुसंधान और पर्यवेक्षण के दौरान सात में से संवेदक सहित दो अभियुक्तों को निर्दोष करार देते हुए पांच के विरूद्व आरोप पत्र समर्पित करने का निर्णय लिया गया था।
पटना के सुल्तानपुर में मिला इंजीनियर का घर
मुकदमे की कार्रवाई आगे बढ़ने के साथ पुलिस को जिनकी तलाश थी, उनमें तत्कालीन कार्यपालक अभियंता ओबैदुर्रहमान के अलावा लेखापाल दिनेश सिंह, जेई श्याम किशोर यादव, रोकड़पाल सीताराम स्वर्णकार एंव दफ्तर के चौकीदार का नाम भी शामिल था। चौकीदार ने तो अदालत में आत्मसमर्पण कर जमानत ले ली थी, मगर चार अन्य अभियुक्तों के तबादले के बाद फिर उनका कोई पता नहीं चला था। एक के बाद एक बदलते गए अनुसंधान अधिकारियों ने भी इस केस की पड़ताल करने के बजाए इसे लटकाए रखने में ही बेहतरी समझी।
रोकड़पाल ने औरंगाबाद में और जेई ने गया में बनाया है ठिकाना
अब ताजा खोजबीन से पता चला है कि सेवानिवृति के बाद रोकड़पाल दिनेश सिंह ने औरंगाबाद में अपना ठिकाना बनाया है, तो जेई श्याम किशोर यादव का घर गया शहर के एपी कॉलोनी इलाके में है, मगर वह रिश्तेदारों के घर में इधर-उधर रहते हैं। पुलिस ने इन अभियुक्तों के घर दस्तक दी है। अभियुक्तों में शामिल रोकड़पाल सीताराम स्वर्णकार का अबतक कोई पता नहीं चला है। पुलिस उन्हें ढूंढ रही है। बताया जाता है कि पुलिस अब इन अभियुक्तों के खिलाफ अदालत से गिरफ्तारी वारंट लेने की कोशिश में है।
डीजीपी और एडीजी के बीच समन्वय से बनी बात
बीस साल से अधिक पुराने मुकदमों के अनुसंधान में यह तेजी बिहार पुलिस के डीजीपी के रूप में विनय कुमार और एडीजी के बतौर कुंदन कृष्णन की तैनाती के बाद सामने आई है। आइपीएस विनय कुमार जहां सीआइडी में लम्बे समय तक रहने के कारण एक बेहतरीन अनुसंधानक माने जाते हैं, वहीं एसटीएफ में तैनाती के दौरान अपराधियों के खिलाफ प्रभावी अभियान चलाने वाले कुंदन कृष्णन की छवि एक कड़क और इमानदार पुलिस अधिकारी की रही है। दोनों अधिकारियों ने अनुसंधान के तरीकों में कई बदलाव के साथ इसकी मॉनिटरिंग की भी पक्की व्यवस्था की है। दोनों के बीच बेहतर समन्वय का थाना स्तर पर अनुसंधान और अपराध नियंत्रण के कार्यों पर भी असर पड़ा है।
बीस साल से लम्बित थी 300 मुकदमों की जांच
पुलिस की एक रिपोर्ट के मुताबिक समूचे बिहार में ऐसे 300 से अधिक मुकदमे थे, जिनका अनुसंधान दो दशक से भी ज्यादा समय से लम्बित था। पिछले वर्ष सितम्बर में बिहार के मुख्य सचिव अमृत लाल मीणा की अध्यक्षता में हुई पुलिस अधिकारियों की बैठक में यह तथ्य सामने आया था कि समूचे राज्य के करीब 1300 थानों में 2.67 लाख मुकदमे अनुसंधान के लिए लम्बित थे। राज्य में अनुसंधान अधिकारियों की संख्या भी करीब 18 हजार थी। तय किया गया था कि अगले छह महीनों के भीतर लम्बित मुकदमों की संख्या को घटाकर एक लाख तक लाना है। इसके लिए थाना स्तर पर मिशन अनुसंधान भी शुरु किया गया था, जिसमें 75 दिनों के भीतर अनुसंधान कार्य पूरा करने और गंभीर मामलों में 60 दिनों के अंदर पुलिसिया जांच पूरा करने का संकल्प लिया गया था।
गया जी से गुड्डू की रिपोर्ट

