बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच तनातनी किसी से छिपी नहीं थी। सीट बंटवारे से लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी तक, दोनों नेताओं के रिश्ते में खटास साफ नजर आ रही थी। लेकिन असली ‘चाल’ चली गई चुनाव के दौरान—और वो भी पूरी तरह लोकतांत्रिक तरीके से।
🎯 बोधगया सीट बनी विवाद की जड़
गया जिले की बोधगया विधानसभा क्षेत्र सीट पर ही पूरा खेल केंद्रित था। यह सीट राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के तहत लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को दे दी गई, जो मांझी को बिल्कुल रास नहीं आई।मांझी इस सीट को अपनी पार्टी हम (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा) के लिए चाहते थे, लेकिन फैसला उनके खिलाफ गया।
🧠 ‘बागियों’ के जरिए पलट दी बाज़ी?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इसके बाद मांझी ने सीधी टक्कर लेने के बजाय एक ‘साइलेंट रणनीति’ अपनाई। बताया जाता है कि उनके करीबी कार्यकर्ताओं नंदलाल मांझी और लक्ष्मण मांझी को अलग-अलग मोर्चों से चुनाव मैदान में उतारा गया। नंदलाल मांझी (निर्दलीय): 10,181 वोटलक्ष्मण मांझी (जन सुराज): 4,024 वोटइन दोनों ने मिलकर 14 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए—जो हार-जीत के अंतर से कई गुना ज्यादा थे।
📊 नतीजा: जीतते-जीतते हार गई LJP
इस सीट पर श्यामदेव पासवान (LJP) को 99,355 वोट मिले, जबकि कुमार सर्वजीत (RJD) ने 1,00,236 वोट पाकर महज 881 वोट से जीत दर्ज की।यानी सीधी लड़ाई में LJP मजबूत दिख रही थी, लेकिन ‘तीसरे खिलाड़ियों’ ने पूरा समीकरण बदल दिया।
🔄 चुनाव के बाद फिर ‘घर वापसी’
सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब चुनाव खत्म होने के बाद वही बागी नेता—खासकर नंदलाल मांझी—फिर से मांझी की पार्टी में शामिल हो गए।इस घटनाक्रम ने राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया—क्या यह सब पहले से तय रणनीति का हिस्सा था?
🤐 चर्चा मे क्यों नहीं बनी?
हैरानी की बात यह रही कि इतनी बड़ी राजनीतिक चाल के बावजूद यह मुद्दा ज्यादा चर्चा में नहीं आया। अगर यह खुलकर सामने आता, तो चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच टकराव एक बार फिर उभर सकता था।
🧾 निष्कर्ष
बोधगया की यह कहानी सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में खेले जाने वाले सूक्ष्म और रणनीतिक दांव-पेच की मिसाल है—जहां बिना शोर किए भी बड़ा खेल हो सकता है।

