आजकल निजी स्कूल सिर्फ पढ़ाई का केंद्र नहीं रहे, बल्कि एक “ऑल-इन-वन शॉपिंग मॉल” बन चुके हैं। एडमिशन लेते ही ऐसा लगता है जैसे बच्चे का नहीं, बल्कि पूरे परिवार का पैकेज बुक हो गया हो।
किताबें? स्कूल से लो।
कॉपी? स्कूल से लो।
पेन-पेंसिल? स्कूल से लो।
यूनिफॉर्म? वही से लो।
यहाँ तक कि जूते-मोज़े भी “स्कूल अप्रूव्ड” ही होने चाहिए! अब अभिभावक सोच में पड़ जाते हैं जब सब कुछ स्कूल ही तय कर रहा है, तो फिर एक छोटी-सी चीज़ के लिए हमें बाहर की दुकान का रास्ता क्यों दिखाया जा रहा है?
निजी स्कूल इसे “ब्रांड वैल्यू” कहते हैं। यानी बच्चा सिर्फ पढ़ने नहीं जाता, बल्कि एक ब्रांड का हिस्सा बनता है—जहाँ हर चीज़ का एक तय पैकेज और तय दाम होता है। विकल्प? वो तो जैसे एडमिशन फॉर्म के साथ ही जमा करवा लिया जाता है।ऐसे में सवाल उठता है—जब स्कूल किताब से लेकर यूनिफॉर्म तक “कंप्लीट सर्विस” दे रहा है, तो फिर अंडरगारमेंट्स क्यों नहीं?कम से कम अभिभावकों को एक काम से तो छुटकारा मिलता!
असल में, यह व्यंग्य सिर्फ अंडरगारमेंट्स पर नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर है जहाँ शिक्षा से ज्यादा “सिस्टम” और “सेल्स” का दबदबा दिखता है। अभिभावक पढ़ाई के नाम पर हर शर्त मान लेते हैं, क्योंकि सवाल बच्चे के भविष्य का होता है।
निष्कर्ष यही है:- निजी स्कूलों ने सुविधा के नाम पर विकल्प छीन लिए हैं—और अभिभावक सुविधा और मजबूरी के बीच फंसे हुए हैं।

