बिहार के गया जी जिले स्थित से एक ऐसी घटना सामने आई है, जो न सिर्फ सिस्टम पर सवाल उठाती है बल्कि इंसानियत को भी कठघरे में खड़ा कर देती है।
अतरी थाना क्षेत्र के करजनी महादलित टोला निवासी 65 वर्षीय विशुनधारी मांझी की मौत लकड़बग्घा के हमले में हो जाती है। परिवार किसी तरह सदमे में शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल लेकर पहुंचता है—लेकिन वहां उन्हें इंसाफ नहीं, रसीद के बिना ‘रेट’ सुनाया जाता है।
आरोप है कि पोस्टमार्टम के नाम पर 1200 रुपये मांगे गए। गरीब बेटा विलास मांझी—जिसके पास पैसे तक नहीं थे—गांव में चंदा करके 700 रुपये देता है, तब जाकर पोस्टमार्टम होता है।
यहीं खत्म नहीं होता यह खेल—
👉 शव लाने के दौरान पुलिस की मौजूदगी में परिजनों से डीजल भरवाया जाता है।
👉 पोस्टमार्टम के बाद शव घर ले जाने के लिए 2200 रुपये और मांगे जाते हैं।
जब मामला मीडिया के सामने आया, तो पैसे वापस कर दिए गए।
लेकिन सवाल वही—क्या बिना कैमरे और खबर के गरीब को न्याय मिलता?
यह घटना सिर्फ एक अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है—
जहां गरीब की मौत भी कमाई का जरिया बन जाती है।
(अधिकारी पक्ष का बयान – इस हमाम में सब नंगे है )

